सारांश
कक्षा 4 पर्यावरण अध्ययन एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक (हमारी अद्भुत दुनिया) का अध्याय 4, "प्रकृति की गोद में", रीना और अमित की जंगल के निकट के गाँव की यात्रा के माध्यम से दिखाता है कि पलाश वृक्ष, मिट्टी के घर, प्राकृतिक रंग, पारंपरिक अनाज-संरक्षण और नीम-तुलसी जैसे औषधीय पौधे हमारे दैनिक जीवन को प्रकृति से कैसे जोड़ते हैं।
- ग्रामीण जीवन में प्राकृतिक सामग्री — रीना और अमित देखते हैं कि गाँव के घर मिट्टी, घास, गोबर और अन्य प्राकृतिक सामग्री से बने हैं — शहरी इमारतों से बिल्कुल अलग। दीवारों को चावल के आटे और पानी से बने रंग से सजाया जाता है। गोंड कला दीवारों पर प्राकृतिक रंगों से बनाई जाती है जिसमें पेड़-पौधे, पशु-पक्षी और मनुष्यों के चित्र होते हैं।
- पारंपरिक अनाज-संरक्षण — गाँव में अनाज को मिट्टी के बर्तनों में नीम की पत्तियाँ बिछाकर और बाँस की टोकरियों के बाहर गोबर की परत लगाकर संरक्षित किया जाता है। इस विधि से अनाज कीटों से बिना रसायन के सुरक्षित रहता है। उत्तराखंड में सूखी लौकी से बनी 'तुमरी' भी अनाज-भंडारण का पारंपरिक साधन है।
- औषधीय पौधे और प्राकृतिक रंग — दादाजी नीम के तेल से बना मिश्रण हाथ-पैर पर लगाकर मच्छरों से बचाव करते हैं। तुलसी और नीम जैसे पौधों के औषधीय गुण बताए गए हैं। प्राकृतिक रंग बनाने की विधि भी सिखाई गई है — गेंदे के फूल, गुड़हल या चुकंदर को 1-2 लीटर पानी में 30 मिनट से 1 घंटे उबालकर छानने से रंग तैयार होता है।
- प्रकृति का सम्मान और संरक्षण — गाँव सौर ऊर्जा से पूरी तरह प्रकाशित होने का उत्सव मना रहा है। 'देववन' (Sacred Groves) — समुदाय द्वारा संरक्षित वन-खंड — पूजा और वन्यजीव-संरक्षण दोनों के लिए महत्त्वपूर्ण हैं। वट पूर्णिमा (बरगद), हरि जिरोति (फलदार वृक्ष) और काजीरंगा हाथी उत्सव जैसे पर्वों से भारत की प्रकृति-सम्मान परंपरा दिखाई जाती है।
मुख्य बिंदु और सूत्र
- 01पलाश के वृक्ष पर नारंगी-लाल फूल खिलने पर पूरा जंगल दूर से लाल-नारंगी दिखता है, इसलिए पलाश को 'अग्निपुष्प या जंगल की ज्वाला' भी कहते हैं; गुजरात में इसे 'केसुदा' कहा जाता है
- 02गाँव के घर मिट्टी, घास, गोबर और अन्य प्राकृतिक सामग्री से बनते हैं; दीवारें चावल के आटे-पानी के रंग से सजाई जाती हैं
- 03प्राकृतिक रंग बनाना — गेंदे के फूल, गुड़हल या चुकंदर को पानी में 30 मिनट से 1 घंटे उबालकर छानें
- 04अनाज को मिट्टी के बर्तन में नीम की पत्तियाँ बिछाकर और बाँस की टोकरी के बाहर गोबर की परत लगाकर कीटों से बचाते हैं
- 05कर्नाटक की जेनू कुरुबा जनजाति शहद निकालने से पहले मधुमक्खियों से क्षमा माँगने के गीत गाती है — प्रकृति के प्रति गहरे सम्मान का उदाहरण
- 06नीम का तेल पारंपरिक मच्छर-निरोधक है — हाथ-पैर पर लगाने से मच्छर दूर रहते हैं
- 07'देववन' (Sacred Groves) — समुदाय द्वारा संरक्षित छोटे वन-खंड जो पूजा और वन्यजीव-संरक्षण दोनों के लिए हैं
- 08पेड़ लगाना, प्लास्टिक से बचना, पक्षियों के लिए दाना-पानी रखना और सफाई अभियान — ये सरल कदम प्रकृति की रक्षा करते हैं
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
01कक्षा 4 'हमारी अद्भुत दुनिया' के अध्याय 4 'प्रकृति की गोद में' की कहानी क्या है?
रीना और अमित जंगल के पास अपने गाँव फसल-कटाई उत्सव के लिए जाते हैं। उसी दिन गाँव पूरी तरह सौर ऊर्जा से प्रकाशित होने का उत्सव भी मना रहा है। वहाँ बच्चे पलाश वृक्ष, प्राकृतिक रंग, मिट्टी के घर, पारंपरिक अनाज-संरक्षण और औषधीय पौधों के बारे में सीखते हैं।
02पलाश को 'जंगल की ज्वाला' क्यों कहते हैं?
जब पलाश के पेड़ पर फूल खिलते हैं तो पूरा जंगल दूर से नारंगी-लाल दिखाई देता है, इसलिए पलाश को 'अग्निपुष्प या जंगल की ज्वाला' कहते हैं। गुजरात में इसे 'केसुदा' कहा जाता है।
03अध्याय के अनुसार प्राकृतिक रंग कैसे बनाते हैं?
गेंदे के फूल, गुड़हल या चुकंदर जैसी चीजें एकत्र करें जिनमें रंग हो। इन्हें 1-2 लीटर पानी में 30 मिनट से 1 घंटे ढँककर उबालें। फिर मिश्रण को छानें — बस प्राकृतिक रंग तैयार है। इससे हल्के रंग के कपड़े पर चित्र बनाएँ।
04गाँव के घर किस सामग्री से बने होते हैं?
रीना और अमित के गाँव के घर मिट्टी, घास, गोबर और अन्य प्राकृतिक सामग्री से बने हैं। दीवारें चावल के आटे और पानी से बने रंग से सजाई जाती हैं। दादी ने फूलों, पत्तियों और रंगीन पत्थरों के पाउडर से बने रंगों से कपड़े पर चित्र बनाए हैं।
05अनाज को कीटों से बचाने की पारंपरिक विधि क्या है?
मिट्टी के बर्तनों के अंदर नीम की पत्तियाँ बिछाकर और बाँस की टोकरियों के बाहर गोबर की परत लगाकर अनाज संरक्षित किया जाता है। इस विधि से अनाज बिना रसायन के कीटों से सुरक्षित रहता है।
06जेनू कुरुबा जनजाति का उदाहरण अध्याय में क्यों दिया गया है?
कर्नाटक की जेनू कुरुबा जनजाति शहद निकालते समय मधुमक्खियों से क्षमा माँगने के गीत गाती है। यह उदाहरण दिखाता है कि परंपरागत समुदाय प्रकृति के प्रति गहरा सम्मान रखते हैं।
07नीम के तेल का पारंपरिक उपयोग क्या है?
अध्याय में दादाजी नीम के तेल से बना मिश्रण हाथ-पैर पर लगाते हैं जिससे मच्छर पास नहीं आते। यह बाजार से मिलने वाले मच्छर-निरोधकों का पारंपरिक और प्राकृतिक विकल्प है।
08'देववन' (Sacred Groves) क्या होते हैं?
'देववन' छोटे-छोटे वन-खंड होते हैं जिन्हें स्थानीय समुदाय पूजा और वन्यजीव-संरक्षण के लिए सुरक्षित रखते हैं। ये भारत की उस परंपरा का हिस्सा हैं जिसमें प्रकृति का सम्मान किया जाता है।
09अध्याय में भारत के कौन-से त्योहार या परंपराएँ उल्लिखित हैं जो प्रकृति का सम्मान करती हैं?
अध्याय में वट पूर्णिमा (बरगद वृक्ष की पूजा), हरि जिरोति (फलदार वृक्षों का उत्सव) और काजीरंगा हाथी उत्सव का उल्लेख है। ये पर्व दिखाते हैं कि भारत में पेड़-पौधों और पशुओं का सम्मान करने की गहरी परंपरा है।
More chapters in हमारी अद्भुत दुनिया
हमारी अद्भुत दुनिया — कक्षा 4 पर्यावरण अध्ययन की NCERT पाठ्यपुस्तक (2026-27 संस्करण) — का अध्याय 4 ऑनलाइन मुफ़्त पढ़ें: NCERT द्वारा प्रकाशित पूरा अध्याय, हर चित्र, हल किए गए उदाहरण और अभ्यास के साथ, चरण-दर-चरण समाधान, उत्तर और रिवीजन नोट्स के साथ। ऊपर दी गई NCERT PDF खोलें, या सभी NCERT कक्षा 4 पाठ्यपुस्तकें देखें।