अध्याय 8: वस्त्र — वस्तुएँ कैसे निर्मित होती हैं?
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कक्षा 5 पर्यावरण अध्ययन एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक (हमारी अद्भुत दुनिया) का अध्याय 8, "वस्त्र — वस्तुएँ कैसे निर्मित होती हैं?", बताता है कि धागों से बुनाई और कताई की प्रक्रिया से कपड़ा कैसे बनता है तथा भारत की हथकरघा परंपराओं, कढ़ाई और रेशमकीट जीवन-चक्र को प्रस्तुत करता है।
- बुनाई — धागों से कपड़ा — बुनाई में धागों का एक समूह लंबवत और दूसरा क्षैतिज बिछाकर उन्हें एक-दूसरे के ऊपर और नीचे से क्रमिक रूप से पार कराया जाता है जिससे कपड़ा, चटाई या टोकरी बनती है। नर बया पक्षी घास की पट्टियों से इसी विधि से सुंदर थैलीनुमा घोंसले बुनता है।
- कताई — तंतु से धागा — सूती तंतुओं को एक साथ लपेटकर धागा या सूत बनाने की प्रक्रिया को कताई कहते हैं। चरखा इसी काम के लिए उपयोगी है। गांधी जी ने कपास से धागा बनाकर खादी तैयार करना स्वतंत्रता संग्राम और आत्मनिर्भरता का प्रतीक बनाया।
- प्राकृतिक और कृत्रिम तंतु — प्राकृतिक तंतुओं में कपास, ऊन, रेशम, सन, जूट और बाँस शामिल हैं। रेशम रेशमकीट के कोकून को गर्म पानी में रखकर और धागा खींचकर प्राप्त किया जाता है। नायलॉन, पॉलिएस्टर, टेरिलीन और रेयॉन कृत्रिम तंतु हैं जो मानव निर्मित सामग्री से बनते हैं।
- भारत की हथकरघा परंपराएँ और कढ़ाई — भारत में 4000 साल पहले से बुनाई होती आई है। हथकरघा परंपराओं में तमिलनाडु की कांजीवरम, कश्मीर की पश्मीना और ओडिशा व गुजरात की इकत प्रसिद्ध हैं। चिकनकारी, फुलकारी, कांथा, बंजारा और कश्मीरी कढ़ाई जैसी परंपराएँ कपड़े को क्षेत्र की कहानी बताने वाली कला में बदलती हैं।
- पुनर्उपयोग और टिकाऊ प्रथाएँ — भारत में परंपरागत रूप से कपड़े छोटे भाई-बहनों को दिए जाते हैं या पुराने कपड़ों से रजाई बनाई जाती है। हथकरघा बुनाई में विद्युत का उपयोग नहीं होता इसलिए यह पर्यावरण के लिए अनुकूल है; गुजरात का काला कपास बिना रसायन और अतिरिक्त जल के उगाया जाता है।
मुख्य बिंदु और सूत्र
- 01नर बया पक्षी घास की पट्टियों को ऊपर-नीचे बुनकर मजबूत थैलीनुमा घोंसला बनाता है — यही तकनीक मनुष्य कपड़ा बुनने में उपयोग करते हैं।
- 02भारत में 4000 साल पहले से बुनाई होती आई है और भारतीय हथकरघा क्षेत्र में 45 लाख से अधिक लोग, विशेषकर महिलाएँ और ग्रामीण कारीगर, काम करते हैं।
- 03कताई वह प्रक्रिया है जिसमें सूती तंतुओं को एक साथ लपेटकर धागा बनाया जाता है; चरखा इसी काम के लिए उपयोग होता है।
- 04रेशम रेशमकीट के कोकून को गर्म पानी में रखकर और धागा खींचकर प्राप्त किया जाता है।
- 05प्राकृतिक तंतुओं में कपास, ऊन, रेशम, सन, जूट और बाँस हैं; कृत्रिम तंतुओं में नायलॉन, पॉलिएस्टर, टेरिलीन और रेयॉन हैं।
- 06भारतीय मलमल इतनी बारीक होती थी कि उसे 'बुनी हुई हवा' कहा जाता था और पूरी साड़ी अँगूठी से निकाली जा सकती थी।
- 07दर्जी पक्षी पत्ते के किनारे पर छेद करके पादप तंतुओं या मकड़ी के धागे से घोंसला सिलता है — जैसे दर्जी सुई-धागे से कपड़ा सिलता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
01बुनाई क्या है और यह कैसे काम करती है?
बुनाई में धागों का एक समूह लंबवत और दूसरा क्षैतिज बिछाया जाता है, फिर उन्हें सावधानीपूर्वक एक-दूसरे के ऊपर और नीचे से क्रमिक रूप से पार कराया जाता है जिससे एक जुड़ी हुई बनी संरचना तैयार होती है जैसे कपड़ा, चटाई या टोकरी।
02नर बया पक्षी का घोंसला बुनाई से किस प्रकार संबंधित है?
नर बया पक्षी घास की पट्टियों को ऊपर-नीचे बुनकर मजबूत थैलीनुमा घोंसला बनाता है जो पेड़ की टहनी से लटकता है। कुशल बया का घोंसला अत्यंत उत्कृष्ट होता है — यही वही तकनीक है जो मनुष्य कपड़ा बुनने में उपयोग करते हैं।
03कताई क्या है और खादी से इसका क्या संबंध है?
कताई वह प्रक्रिया है जिसमें सूती तंतुओं को एक साथ लपेटकर धागा बनाया जाता है। चरखे पर की गई कताई से बने कपड़े को खादी कहते हैं। गांधी जी ने इसे स्वतंत्रता संग्राम और आत्मनिर्भरता का प्रतीक बनाया।
04रेशम कैसे बनता है?
रेशम रेशमकीट के कोकून से प्राप्त होता है — कोकूनों को गर्म पानी में रखा जाता है और धागा खींचकर रेशमी कपड़ा बनाया जाता है।
05प्राकृतिक और कृत्रिम तंतुओं में क्या अंतर है? उदाहरण दीजिए।
प्राकृतिक तंतु पौधों और जंतुओं से मिलते हैं जैसे कपास, ऊन, रेशम, सन, जूट और बाँस। कृत्रिम तंतु मानव निर्मित सामग्री से बनते हैं जैसे नायलॉन, पॉलिएस्टर, टेरिलीन और रेयॉन।
06भारत की प्रसिद्ध हथकरघा परंपराएँ कौन सी हैं?
भारत में अनेक हथकरघा परंपराएँ हैं जिनमें तमिलनाडु की कांजीवरम, कश्मीर की पश्मीना और ओडिशा व गुजरात की इकत प्रमुख हैं। प्रत्येक की अपनी अनूठी तकनीक और प्रतिरूप है।
07भारतीय मलमल के बारे में उल्लेखनीय तथ्य क्या है?
भारतीय मलमल इतनी बारीक होती थी कि उसे 'बुनी हुई हवा' कहा जाता था और इससे बनी पूरी साड़ी को एक अँगूठी के बीच से निकाला जा सकता था।
08हथकरघा बुनाई पर्यावरण के लिए किस प्रकार अनुकूल है?
हथकरघा बुनाई में विद्युत का उपयोग नहीं होता इसलिए यह पर्यावरण के लिए अनुकूल है। इसके अलावा गुजरात का काला कपास बिना रसायन और अतिरिक्त जल के उगाया जाता है, और पुराने कपड़ों का पुनर्उपयोग करके रजाई बनाई जाती है।
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